शनिवार, 23 नवंबर 2013

'एचआईवी से बचा सकता है सर्वदेवामयी गौ माता का दूध'

गाय का दूध अब एचआईवी को दूर भगाएगा। जी, हां यह सच है। ऑस्ट्रेलिया में हुए एक रिसर्च से इस बात का खुलासा हुआ है। इसमें दावा किया गया है कि गाय के दूध को आसानी से एक ऐसी क्रीम में बदला जा सकता है जो इंसान को एचआईवी से बचा सकता है।

मेलबर्न यूनिवर्सिटी के चीफ साइंटिस्ट मेरिट क्रेमस्की ने रिसर्च के दौरान पाया कि जब प्रेगनेंट गाय को एचआईवी प्रोटीन का इंजेक्शन दिया गया, तो उसने हाई लेवल की रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला दूध दिया जो नवजात बछड़े को बीमारी से बचाता है। गाय द्वारा बछड़े को जन्म दिए जाने के बाद पहली बार दिए गए दूध को 'कॉलोस्ट्रम' कहा गया।

हेराल्ड सन की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों की योजना इस दूध को क्रीम में बदलने से पहले उसके प्रभाव और सुरक्षा का टेस्ट करना है। यह क्रीम पुरुषों से यौन संबंध बनाने के दौरान वायरस से बचा सकती है। प्रभावित सेल्स को दूध के साथ मिलाने के बाद वैज्ञानिक इस वायरस को फैलने से रोकने में सफल रहे थे।

क्रेमस्की ने बताया कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का यह सबसे सस्ता और आसान रास्ता है। उन्होंने कहा कि कॉन्डम सस्ते और आसान उपाय हैं लेकिन जहां हर साल लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं, वहां ये विकल्प नहीं हो सकते। खासकर, साउथ अमेरिका और अफ्रीका में, जहां औरतों को सेक्स के दौरान यह कहने की आजादी नहीं है कि हमें कॉन्डम का यूज करना चाहिए।

क्रेमस्की ने कहा, 'ऐसे में यह दूध एचआईवी को रोकने का सबसे सस्ता और आसान उपाय हो सकता है। अगर आप दवाईयों का यूज करते हैं तो यह सच में महंगी होती हैं।

Serve the cow Serve the country

Serve the cow Serve the country 

Creating awareness among the people for urgent need of protection and conservation of cows:- 
1. Maintaining the neglected street cows by construction cows sheds for them. 
2. Saving the cows from butchers and caring them by keeping in the cow shed.
3. Propagating the boycott of goods manufactured by the skin of cows.
4. Publicizing importance of the cow dung and its urine.
5. Uplifting the merit and status of backward people by inspiring them to serve boon giver cows.
6. Publicizing the use of cow dung and its urine instead of fertilizer as manure.
7. Not to sell cows to Stranger or a butcher.
8. Giving priority to the good quality of native bulls for progeny of cows.
9. Organizing sammelans, programmers and padyatras at national level to mobilize public opinion in favour of cow conservation and protection.
10. To propagate the medicinal properties of five elements of the cow (milk, curd, ghee, urine and dung) among the people.
11. Correspondence with developed and developing countries the central govt., states govt. and NGOs to encourage scientific research on the product of the cow.
12. To make representation to Indian government and foreign governments for passing law against cow slaughter.
13. To do all miscellaneous services for the welfare of cows.
14. To bring on one platform all organizations dedicated to the cause of cow protection.
15. To support the setting up of fodder banks at multiple places.
16. To encourage and popularize the use of cow based products in food and medicine.
17. o suitably deal with the issue of slaughtering the cow and work towards its prevention. For the purpose, cows not to give unknown person-rather cows in danger should be brought to safe enclosure.
18. To spread awareness in society about the protection of the cow, to encourage feelings of devotion to the cow; to participate in all activities towards the well being the cow.

श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज का गोरक्षा के संबंध में देश के संत-महात्माओं से एक निवेदन

सादर हरि: स्मरण!

सभी साधु-संतों से मेरी प्रार्थना है कि अभी गायों की हत्या जिस निर्ममता से हो रही है, वैसी तो अंग्रेजों व मुसलमानों के साम्राज्य में भी नहीं होती थी। अब हम सभी को मिलकर इसे रोकने का पूर्णरुप से प्रयास करना चाहिये। इस कार्य को करने का अभी अवसर है और इसका होना भी सम्भव है। गाय के महत्व को आप लोगों को क्या बतायें, क्योंकि आप तो स्वयं दूसरों को बताने में समर्थ हैं। यदि प्रत्येक महंतजी व मण्डलेश्वरजी चाहें तो हजारों आदमियों को गोरक्षा के कार्य हेतु प्रेरित कर सकते हैं। आप सभी मिलकर सरकार के समक्ष प्रदर्शन कर शीघ्र ही गोवंश के वध को पूरे देश में रोकने का कानून बनवा सकते हैं। यदि साधुसमाज इस पुनीत कार्य को हिन्दू-धर्म की रक्षा हेतु शीघ्र कर लें तो यह विश्वमात्र के लिये बड़ा कल्याणकारी होगा। अभी चुनाव का समय भी नजदीक है। इस मौके पर आप सभी एकमत होकर यह प्रस्ताव पारित कर प्रदर्शन व विचार करें कि हर भारतीय इस बार अन्य मुद्दों को दरकिनार कर केवल उसी नेता या दलको अपना मत दे जो गोवंश-वध अविलम्ब रोकने का लिखित वायदा करे तथा आश्वस्त करे कि सत्ता में आते ही वे स्वयं एवं उनका दल सबसे पहला कार्य समूचे देशमें गोवंश-वध बंद कराने का करेगा।

देशी नस्ल की विशेष उपकारी गायों के वशं तक के नष्ट होनेकी स्थिति पैदा हो रही है, ऐसी स्थिति में यदि समय रहते चेत नहीं किया गया तो अपने और अपने देशवासियों की क्या दुर्दशा होगी, इसका अन्दाजा मुश्किल है। आप इस बात पर विचार करें कि वर्तमान में जो स्थिति गायों की अवहेलना करने से उत्पन्न हो रही है, उसके कितने भयंकर दुष्परिणाम होंगे। अगर स्वतन्त्र भारत में गायों की हत्या-जैसा जघन्य अपराध भी नहीं रोका जा सकता तो यह कितने आश्चर्य और दु:ख का विषय होगा। आप सभी भगवान्‌ को याद करके इस सत्कार्य में लग जावें कि हमें तो सर्वप्रथम गोहत्या बंद करवानी है जिससे सभी का मंगल होगा। इससे बढ़कर धर्म-प्रचारका और क्या पुण्य-कार्य हो सकता है।

पुन: सभी से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि आप सभी शीघ्र ही इस उचित समय में गायों की हत्या रोकनेका एक जनजागरण अभियान चलाते हुए सभी गोभक्तों व राष्ट्रभक्तों को जोड़कर सरकार को बाध्य करके बता देवें कि अब तो गोहत्या बंद करानेके अतिरिक्त सत्तामें आरुढ़ होनेका कोई दूसरा उपाय नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि जनता-जनार्दन ने देश में गोहत्या बंद करानेका दृढ़ संकल्प ले लिया है। 

गाय के दर्शन, स्पर्श, छाया, हुंकार व सेवासे कल्याण, सुखद अनुभव, सद्भाव एवं अन्त:करण की पवित्रता प्राप्त होती है। गाय के घी, दूध, दही, मक्खन व छाछ से शरीरकी पुष्टि होती है व निरोगता आती है। गोमूत्र व गोबर से पञ्चगव्य और विविध औषधियाँ बनाकर काम में लेने से अन्न, फल व साग-सब्जियों को रासायनिक विष से बचाया जा सकता है। गायों के खुर से उड़ने वाली रज भी पवित्र होती है; जिसे गोधूलि वेला कहते हैं, उसमें विवाह आदि शुभकार्य उचित माना जाता है। जन्म से लेकर अन्तकाल तक के सभी धार्मिक संस्कारों में पवित्रता हेतु गोमूत्र व गोबर का बड़ा महत्व है। गाय की महिमा तो आप और हम जितनी बतायें उतनी ही थोड़ी है, आश्चर्य तो यह है सब कुछ जानते हुए भी गायों की रक्षामें हमारे द्वारा विलम्ब क्यों हो रहा है? गाय की रक्षा करनेसे भौतिक विकासके साथ-साथ आर्थिक, व्यावहारिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं अनेकों प्रकारके विकास सम्भव हैं, लेकिन गाय की हत्या से विनाश के सिवाय कुछ भी नहीं दिखता है। अत: अब भी यदि हम जागें तो गोहत्या को सभी प्रकार से रोक कर मानव को होने वाले विनाश से बचा सकते हैं। गो-सेवा, रक्षा, संवर्धन तथा गोचर भूमि की रक्षा करने से पूरे संसार का विकास सम्भव है। आज गोवध करके गोमांस के निर्यात से जो धन प्राप्त होता है उससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। इसलिये ऐसे गोहत्या से प्राप्त पापमय धनके उपयोगसे कथित विकास ही विनाशकारी हो रहा है। यह बहुत ही गम्भीर चिन्ताका विषय है।

अन्तमें सभी साधुसमाज से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि अब शीघ्र ही आप सभी और जनता मिलकर गोहत्या बंद करानेका दृढ़ संकल्प लेनेकी कृपा करें तो हमारा व आपका तथा विश्वमात्रका कल्याण सुनिश्चित है। इसीमें धर्मकी वास्तविक रक्षा है और धर्म-रक्षामें ही हम सबकी रक्षा है। 

पढ़ें, पढ़ायें, आगे बढ़ायें।

प्रार्थी

स्वामी रामसुखदास

(‘कल्याण’ वर्ष-७८, अंक ४)

बुधवार, 20 नवंबर 2013

संरक्षण का रास्ता गो रक्षा में प्रगति

प्रागैतिहासिक काल में हमारे पूर्वज गायों को अपने बच्चों की तरह प्रेमपूर्वक देखभाल करते थे । यज्ञों के दौरान गायों को चढ़ाव और विनिमय में अत्यंत महत्व था । किसी व्यक्ति के धन का आकलन उसकी गायों की संख्या द्वारा किया जाता था । राजाओं को कर और भेंट देने में गाय का महत्व नकदी, आभूषणों, हाथियों और घोड़ों से अधिक था ।

सामाजिक स्थिति का परिणाम :

गायों की संख्या पर आधारित सम्मान इस प्रकार थे

नंदराज – १ कारोड़
वृषभ राज – ५० लाख
वृष भानु – १० लाख
नंद – ९ लाख
उपांड – ५ लाख
व्रज – १० हजार
गो संरक्षण, संवर्धन का रास्ता :

रामायण में रघुवंश का आरंभ दिव्य गाय की आशिष से होता है ।
महाभारत युग में श्री कृष्ण और उनके कुटुंबियों द्वारा गाय की अनुकरणीय सेवा की गई ।
अद्वैत दर्शन की पुनर्स्थापना में आदि शंकराचार्य ने गाय को प्रमुख स्थान दिया ।
गायों की देख-भाल, उनके लिये चरने योग्य भूमि, आहार, की सार संभाल के लिये चाणक्य के अर्थशास्त्र (मौर्य युग में) एक गो अध्यक्ष नामक राजकीय अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी । (कौटिल्य अर्थशास्त्र – गो अध्यक्ष अध्याय)
अशोक महान का विश्वास था कि राष्ट्र की समृद्धि और गौरव हेतु गायों का विकास आवश्यक है ।
शातवाहन वंश ने गोपालन और गोदान को सर्वाधिक महत्व दिया ।
गायों के लिये राजपूतों ने अपने प्राण दे दिये । कुटिल उद्देश्यों तहत मोहम्मद गोरी ने अपने सैनिकों के आगे गायें रखकर पृथ्वीराज पर आक्रमण किया । गायों की हत्या न करपाते हुए पृथ्वीराज ने हार मान ली ।
शिवाजी ने १७ वर्ष की आयु में वधशाला के तरफ गाय को खींचकर ले जाते हुए कसाई का शिरच्छेद किया ।
मुगलवंश के संस्थापक बाबर ने अपने पुत्र हुमायुं को गायों को कभी न मारने को लिखा ।
अबुल फजल ने आईने अक्बरी में लिखा कि हिंदू प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए अकबर ने गोमांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया था ।
अपने यात्रा विविरण में बर्नियर ने लिखा है कि जहांगीर के राज्य में गो हत्या प्रतिबंध सख्ती से पालन होता था ।
विजयनगर राजय में बहु संख्यक लोग मांस भक्षण करते थे । पर गोमांस को कोई भी नहीं लेता था ।
मैसूर राज्य के आयुक्त मार्क कबन ने राज्य प्रशासन को ९ भागों में विभक्त किया । इनमें से एक विभाग कर्नाटक के गौरव अमृत महल बैलों के नाम पर रखा गया और इसमें गो पालन का कार्य होता था ।
सर्वोच्च न्यायालय के १९५८ के एक निर्णय में उल्लेख है कि १८वीं सदी में हैदर अली का आदेश था कि गोवधकर्ता के हाथ काट दिये जाने चाहिए ।
मैसूर राज्य में ४,१३,५३९ एकड़ भूमि पर २४० चरागाह मैदान थे । जो कि ‘बेण्णे चावड़ी’ प्रजाति की गायों के लिये थे । ये गायें १६१७ के वर्ष के आसपास राज्य संरक्षण में फल फूल रही थीं । टीपू सुल्तान के समय में इनका नाम अमृत महल रख दिया गया और इनके लिये सुरक्षित की गयी भूमि को अमृत महल सुरक्षित भूमि से सूचित किया गया ।
पहला स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) अंग्रेजों द्वारा कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के कारण हुआ ।
अपने वंश में सर्वाधिक शक्तिशाली माधवराव पेश्वा ने गो हत्या पर प्रतिबंध लगाया । उनका विचार था कि गो भक्षकों को समस्त भारत से निकाल दिया जाये ।
१८७२ में नामधारी सिखों के नेतृत्व में पंजाब में कल्लगाहों की स्थापना के विरुद्ध कुका आंदोलन हुआ ।
वीर सावारकर, चंद्रशेखर आजाद, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों ने गो हत्या के विरोध में आवाज उठाई । यह वचन दिया गया कि स्वतंत्र भारत में गो हत्या पर रोक लगेगी ।
संविधान की धारा १८ में गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात है ।
१९६६ में गोवध विषेध हेतु लाखों लोगों ने संसद के विकट प्रदर्शन किया ।
१९७९, १९८५, १९९०, १९९४, १९९९ और २००० में संसद में गो हत्या विषेध के लिये सदस्यों ने निजी

प्रस्ताव प्रस्तुत किये ।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने १९८२ में राज्य सरकारों से गोवध पर प्रतिबंध लगाने को लिखा ।
१९४४ में गुजरात में और बाद में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में गो हत्या पर रोक लगा ।
राष्ट्रीय मवेशी आयोग २००१ में स्थापित हुआ ।
श्री दत्त शरणानंदजी महाराज के नेतृत्व में राजस्थान में पथमेडा में गोपाल गोवर्धन गोशाला के अंतर्गत एक लाख से भी अधिक गायों का पालन पोषण होता है ।
गायों और गो उत्पादों पर श्री सभा बहादुर सिंह प्रशंसनीय शोधकार्य कर रहे है ।

रामचंद्रापुर मठ के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी के नेतृत्व और निर्देशन में कामदुघा योजना चालू की गयी है । इस योजना के चार मूलभूत उद्देश्य हैं – भारतीय प्रजाति की गायों की रक्षा, उनकी समृद्धि, उन पर शोधकार्य और उनके बारे में जागृति । होसनगर के अमृतधारा गोलोक अवशिष्ट ३३ देसी गायों की नस्लों में से ३० का संरक्षण एवं पालन कर रहा है । देश भर में ऐसे १०८ केंद्रों की स्थापना की योजना है । प्रकल्प की आर्थिक आत्मनिर्भरता उत्साहजनक है ।
निम्नलिखित प्रजातियों के लिये विकास केंद्र इन स्थानों पर स्थापित किये गये हैं :
राठी नसल – बिकानेर में
दियोनि नसल – बीदर और आंध्रा में
अमृत महल नसल – अज्जंपुर में (कर्नाटक)
हल्लिकार नसल – तुमकूर में
खिलारि नसल – हावेरी में
कृष्णा नसल – होसनगर में (कर्नाटक)
मलेनाडु गिड्ड नसल – मुळिया, कैरंगळ, भान्कुळि में (कर्नाटक)
कासरगोड नसल – बजकूड्लु में (केरल)
हर्याणा, थारपरकर नसल के केंद्र भी हैं ।

वर्तमान में अनेक धार्मिक और अन्य संगठन गो संरक्षण / पालन में सक्रिय हैं । गाय केंद्रों का पिंजरापोल नेटवर्क प्रसिद्ध है ।
विश्व के अन्य देशों में :

क्यूबा में फिडेल कास्प्रो द्वारा बनाया हुआ गो हत्या विषेध कानून आज भी लागू है ।
ईरान में गोहत्या पर कानूनी प्रतिबंध है ।
इंडोनेशिया के नूपानिसद द्वीप में गोमांस भक्षण निषिद्ध है ।
ब्राजील की ९८% गायें भारतीय ओंगोल प्रजाति कि हैं ।
आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भारतीय और स्थानीय गायों के संकर प्रजनन द्वारा ‘ब्राह्मण’ प्रजाति की गायें तय्यार की हैं ।
दक्षिण अफ्रिका में दहेज में २० गायें देने की परंपरा है ।
बर्मा में गो हत्यारों को फांसी दी जाती थी ।
अफगानिस्तान में ११०वां अहल सुन्नत ने गो हत्या के विरुद्ध फतवा जारी किया है ।
बेबिलोन और सुमेरु सभ्यताओं में गोवध निषिद्ध था ।

गौ पुत्रो, गौ रक्षको एवं गौ माता को संरक्षित करने वालो से एक अपील

गौ माता को बाचाने के और भी तरीके है जैसा की हमारी नजर में एक गौ माता अपने बीस साल के पूरे जीवन में अपने पंचगव्य से हमें लगभग एक से डेढ़ करोड़ का लाभ दे जाती है 
अब आप पूछेंगे कैसे तो मै बताता हु
जो गाय माता सिर्फ गोबर और गौमूत्र करती है
एक साधारण गौ माता प्रतिदिन लगभग ३ लीटर गौमूत्र करती है
और मिनिमम सुखा गोबर 1 किलो
और १ लीटर गौमूत्र = 150 रूपये
और 1 किलो गोबर = 50 रुपये
ये एक दिन का प्राफिट है
अब इसको 1महीने से गुणा करते है
तो
गौमूत्र
150 * 3= 450* 30 = 13500 रुपये एक महीना
13500* 12= 162000 रुपये एक साल का
162000*20=3240000 रुपये बीस साल का
अब गोबर
50रुपये क दिन का
50 * 30 = 1500 महीना
1500*12 =18000 साल का
18000* 20 = 360000 बीस साल का
टोटल =3600000 बीस साल का
ये तो सिर्फ गोबर और गौमूत्र का हिसाब है
इन सबकी हम फर्मुलेसन भी करते है
जैसे इनसे धूपबत्ती बनाना , फिनाइल बनाना ,कीटरोधक बनाना ,बर्तन धुलने का पावडर बनाना
पंचगव्य से लगभाग 52 वस्तुओ का निर्माण करना हम बताते है जिससे आय का स्रोत भी बढ़े और हमारी गौ माता भी बची रहे
और हमारी नजर में हम गौ माता को येसे ही बचा सकते है
जी भाई बंधू हमसे सहमत हो
इसपर विचार करे
और इस तरह गौ माता को बचाने में सहयोग करे 

आप सबके लिए गौ माता का उपहार गौ-पीयूष (Cow-Colostrum)

गौ माता से हम मानवों को एक विशेष पदार्थ उपहार में मिलता है - गौ-पीयूष (Cow-Colostrum) एक गाय प्रसूत होने के उपरान्त एवं दूध स्त्रवण से पहले 72 घंटों में जो पीला, गाढ़ा द्रव्य पदार्थ स्त्रावित होता है, उसे ही गौ-पीयूष (Cow-Colostrum) या स्थानीय भाषा के खीस कहते है 
गौ पियूष की मात्रा लगभग ३६ लीटर होती है .पियूष गाड़ा दिखने में पीला तथा हाथ से छूने मेंअत्यधिक चिकना होता है
गौ-पियूष में येसे असंख्य घटक द्रव्य है जो मानव के लिए लाभकारी है इनकी संख्या ९० है
जो लिस्ट में हम दे रहे है
एवं इन ९० तत्यों में ११ मुख्या है जिनका विबरण हम यहाँ दे रहे है
1. Immunoglobins -> शरीर पर कीतादुओ का मजबूती से सामना करते है .
2. Lactoferrin -> ये शरीर में लोह तत्वा को मजबूत करते है एवं सुजन कम करते है .
3.Proline rich polypeptide(PRP) -> पी आर पी गौ पियूष में पाया जाने वाला सबसे लाभकारी तत्वा है . यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ता है शरीर में एंटीबडीश /एंटीजन की कोसिकाओ में बडहोत्री कर्ता है . ये एंटीबडीस कीटाणु और कैंसर की कोसिकाओ को नस्त कर्ता है
यच. आइ. वि .से ग्रसित मरीजो में सी डी4 कोसिकाओ की बडहोत्री कर्ता है .
बाकि के तत्यो के बारे में जारी है ..........................

गाय का घी(देशी भारतीय नस्ल की गौ माता )

गाय के घी को अमृत कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है। गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है।
दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है।
सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।
नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जा
ता है।
गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है।
20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।
गाय के घी की झाती पर मालिश करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।

अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन संतुलित होता है यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है।

देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।

गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।
गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ठीक हो जाता है
गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
विशेष :-स्वस्थ व्यक्ति भी हर रोज नियमित रूप से सोने से पहले दोनों नशिकाओं में हल्का गर्म (गुनगुना ) देसी गाय का घी डालिए ,गहरी नींद आएगी, खराटे बंद होंगे और अनेको अनेक बीमारियों से छुटकारा भी मिलेगा।



सुविचार

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सोमवार, 18 नवंबर 2013

इंदिरा गांधी को पूज्य करपात्री जी महाराज ने श्राप दिया था |

इंदिरा गांधी को पूज्य करपात्री जी महाराज ने श्राप दिया था |

और वो सच हुआ था !!!

1966 में लगभग २५० संतों की हत्या इंदिरा गाँधी ने कराई थी,,,,

इंदिरा गांधी के लिये उस वक्त चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था।

शास्त्री जी की हत्या के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गाँधी चुनाव में खड़ी
हुई थीं,

उनका जीतना संदेहास्पद था क्यों कि जन मानस में उनकी छवि अत्यंत खराब थी.

करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंद्रा गांधी चुनाव जीती ।

इंद्रा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे
कत्ल खाने बंद हो जायेगें ।जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं ।

और जैसा की आप जानते हैं । वादे से मुकरना नेहरु परिवार की खानदानी आदत है ।
चुनाव जितने के बाद कृपात्री जी महाराज ने कहा और मेरा काम करो न,,,
गाय के सारे कत्ल खाने बंद करो ।

इंद्रा ग़ांधी ने धोखा दिया । कोई कत्लखाना बंद नहीं किया गया ।
(तब रोज कि 15000 गाय कत्ल की जाती थी.अब एक लाख से अधिक गऊएं
काटी जाती हैं,,,

आज तो मनमोहन सिंह ने गाय का मास बेचने वाले देशो भारत को पुरी दुनिया
में तीसरे नंबर पर ला दिया है ।)

खैर तो फ़िर करपात्री जी महाराज का धैर्य टूट गया !

करपात्री जी ने एक दिन लाखो भगतो,,संतों के साथ संसद क़ा घिराव कर दिया |

और कहा की गाय के कतलखाने बंद होगे इसके लिये बिल पास करो |

बिल पास करना तो दूर...

इंद्रा गांधी ने उन पर भगतो,,संतों के उपर गोलिया चलवा दी सैंकड़ो गौ सेवक एवं
संत मारे गए !

तब करपात्री जे ने उन्हे श्राप दे दिया की जिस तरह तुमने गौ सेवको पर गोलिया
चलवाई है उसी तरह तुम मारी जाओगी.

जिस दिन इंद्रा गांधी ने गोलिया चलवाई थी उस दिन गोपा अष्टमी थी.
(गाय के पूजा का सब्से बड़ा दिन)

और जिस दिन इंद्रा गांधी को गोली मारी गई उस दिन भी गोपा अष्टमी थी !

करपात्री जी महाराज का श्राप फलित हुआ,,,,,

अतः कांग्रेसियों से,समस्त सेकुलर पंथियों से अनुरोध है कि अति शीघ्र गऊ हत्या
बंद कराएं अन्यथा गऊ माता के श्राप के कारण कभी सुख से ना तो शासन कर पायेंगे और ना ही रह पायेंगे,,,,

गऊ माता की रक्षा के लिए प्रत्येक भारतवासी उस नेता को चुनें जो गोहत्या को बंद कराने के पक्ष में हो।

प्रत्येक भारतवासी ऐसी सरकार को चुनें जो गोहत्या को बंद कराने के पक्ष में हो।

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

पूज्य करपात्री जी महाराज के आंदोलन एवं अन्य आंदोलनों का विवरण
---पांचजन्य से साभार

कांग्रेस नहीं चाहती थी सो नहीं रुका गोवध

स्वतन्त्रता के कई वर्ष पूर्व और आज 66 वर्ष बाद हमारे गौरक्षा के कई आन्दोलनों,
बहुत सारे बलिदानों और अनेकानेक जन चेतना के कार्यक्रमों का परिणाम यह
दर्शाता है कि गाय को बचाने में हम बुरी तरह परास्त हुए हैं।

हमारे बहुत सारे प्रयत्नों में कुछ ऐतिहासिक, कुछ दुखद और कुछ जनचेतना के आन्दोलन हुए।

इनमें सबसे दु:खदायी 7 नवम्बर, 1966 को गोवध बन्द करने का आन्दोलन संतों
और अन्य गोप्रेमियों का हुआ,

जिसमें लगभग 250 संतों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

उन्हें बड़ी बेरहमी से अन्धाधुन्ध गोलियों की बौछार से भून दिया गया।

ऐसा वातावरण बनाया गया था जैसे सरकार जान लेने पर तुली हुई थी।

यही नहीं, रात के अन्धेरे में मरे और अधमरे हुए संत और अन्य गोभक्तों को बड़ी बेरहमी से ट्रकों में लादकर दिल्ली से बाहर रिज़ पर ले जाया गया और बिना देखे कि उनमें कुछ जीवित हैं, उन पर पेट्रोल डालकर जला दिया गया।

इसका प्रमाण वे लोग हैं, जिन्होंने जान की बाजी लगाकर उन ट्रकों का पीछा किया जिसमें मरे हुए और मूर्छित हुए संतों को ऐसे लादा गया जैसे गेहूँ की बोरियों को
एक दूसरे के ऊपर लादा जाता है।

उस समय के वरिष्ठ नेता और सरकार के अन्दर की जानकारी रखने वालों का
कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने गृहमंत्री गुलजारी लाल नन्दा
को कहा कि आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दे दो।

इसके उत्तर में नन्दा ने कहा कि यह कार्य उचित नहीं है जिसके बाद उन्होंने
अपना त्यागपत्र दे दिया।

यह तो थोड़े से शब्दों का ब्यौरा है, जिस आन्दोलन ने समाज को दुखी तो किया
लेकिन समाज की आत्मा को इतना नहीं झकझोरा कि वह उस समय की सरकार को मतदान के बल से उखाड़ फेंके।

गोग्राम यात्रा

ऐसा ही एक और आन्दोलन गोग्राम यात्रा का था। जिसमें गोभक्तों ने गांव-गांव में
जाकर जनता को गोरक्षा के लिए लोगों को जागृत किया।

इस आन्दोलन की अवधि लम्बी रही, इस आन्दोलन से लोगों में चेतना तो आई
परन्तु यह चेतना इतनी भयंकर न थी कि जनता उन लोगों को चुनकर विधानसभा
और लोकसभा में न भेजें जो गोवध बन्द करने के विधेयक का समर्थन नहीं करते हैं।

उस आन्दोलन का एक प्रभावशाली पहलू यह रहा कि गौशालाओं में वृद्घि हुई
और गोरक्षा की संस्थाओं के साथ ऐसे लोग जुड़े जो आये दिन कत्लखानों में ले
जाई जा रही गायों को बचाते रहे।

लोकसभा में विधेयक

ऐसे ही एक बहुत बड़ा कदम गोरक्षा के सम्बन्ध में वर्ष 1952 में लोकसभा में उठा।
जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सेठ गोविन्द दास ने दूध देने वाली गायों को कत्ल न करने
वाला विधेयक संसद के समक्ष रखा।
क्योंकि यह विधेयक सरकारी नहीं था।

इसलिए हर वर्ष थोड़े-थोड़े समय के लिए वर्ष 1955 तक उस पर चर्चा होती रही।

सेठ गोविन्ददास ने कहा कि वर्ष 1947-48 में जो समिति बनी थी उसने गोवध पर
पूरा और प्रभावशाली प्रतिबन्ध लगाने को कहा था।

उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी ने कहा था कि राज्य सरकारें बूढ़ी, अपंग
और बीमार गायों की देख रेख करें।

विनोबा भावे ने भी इस प्रस्ताव की सराहना की थी।

सेठ गोविन्ददास का कहना था कि जब तक गोमांस और गाय की खाल का निर्यात
बन्द नहीं हो जाता तब तक गायों का कटना बंद नहीं होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि वन विभाग की जमीन की देखरेख ऐसी की जाये जहां गायें आराम से चर सकें।

दु:ख की बात यह है कि जब ये प्रस्ताव सेठ गोविन्ददास ने लोकसभा में रखा तो जवाहर लाल नेहरू ने उठकर कहा कि वह चाहते हैं कि लोकसभा इस प्रस्ताव को नकार दे।

यही नहीं इस प्रस्ताव पर 2 अप्रैल 1955 की बैठक में जबकि सब सदस्य इसे पारित कराने के पक्ष में थे तो नेहरू ने कहा कि वह इस बात को साफ-साफ कहना चाहते हैं
कि लोकसभा इसे नकारे और

अगर यह विधेयक पास किया गया तो वह प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे देंगे।

पांच वर्ष की अवधि में इस बिल पर छ: बार विचार हुआ और जितने भी सदस्यों ने
इसमें भाग लिया सभी ने इसका समर्थन किया।

एक महत्वपूर्ण बात तो यह कि उस समय के प्रभावशाली खाद्य-मंत्री रफी अहमद किदवई ने भी इस बिल की सराहना की और कहा कि एक बड़ा जनसमूह गाय को
माता का दर्जा देता है और समूह की भावना गाय काटने से आहत होती है तो इसलिए
इस विधेयक को पास किया जाये।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में इतने बड़े जनसमूह का आदर होना चाहिए।

इन सब बलिदान और जनचेतनाओं से गोवध बन्द तो नहीं हुआ बल्कि गोप्रेमियों
को चिढ़ाने के लिए कत्लखाने बढ़ा दिए गए,,,

और मांस और खाल का निर्यात कई गुणा अधिक बढ़ा दिया गया।

यही नहीं रात के सन्नाटे में गलियों दर गलियों के अन्दर चोरी-छिपे कई घरों में
अवैध रूप से गाय काटी जाती है।

गाय के मांस और उसकी खाल के निर्यात में तो चौंका देने वाली वृद्घि हुई है।

गाय की आबादी जो स्वतन्त्रता के समय 117 करोड़ थी वह आज घटकर 12 करोड़
के लगभग रह गई है।

गाय की कई उत्तम नस्लें समाप्त हो गई हैं और कई नस्लें तो लुप्त होने के कगार
पर पहुंच गई हैं।

यह तो दुखद दास्तान हमारी पूज्य गोमाता- जो देश में सब बच्चों, हिन्दू, मुस्लिम,
सिख, ईसाई, का अपने दूध द्वारा पालन करती है लेकिन फिर भी यह लाखों की
संख्या में भारत में काटी जाती हैं।

इसको रोकने के लिए सभी समुदायों को एकजुट होकर प्रयत्न करना चाहिए।
हर सभी भारतवासियों को सोचना चाहिए कि गाय कैसे बचे और इसकी वृद्घि कैसे
हो ताकि दूध की बढ़ती आवश्यकता को पूरा किया जा सके।

साथ ही हिन्दुओं की भावनाओं को भी आहत होने से रोका जा सके।

कारगर कदम

हमने सभी प्रयत्न कर लिए परन्तु गोवध बन्द नहीं हुआ और न ही बन्द होने के कोई आसार दिखाई दे रहे हैं।

हमें इस विषय पर सोचना है कि गाय को कैसे बचाया जाय।

इसके लिए प्रत्येक भारतवासी उस नेता को चुनें जो गोहत्या को बंद कराने के पक्ष
में हो।

ऐसे लोगों को बिल्कुल भी अपना मत न दें, जो गोहत्यारों के पक्षधर हो।

दूसरा उपाय यह है कि गाय के हर उत्पाद, विशेषकर गोबर और गोमूत्र, का पूरा लाभकारी उपयोग करना होगा।

देश की कुछ बड़ी और छोटी गौशालाओं में गोबर और गोमूत्र से कई वस्तुएं बनाई जा
रही हैं और इसके हमें लाभकारी नतीजे भी मिल रहे हैं।

परन्तु यह काफी नहीं है।

अगर हमें गोवंश को बचाना है तो गोबर और गोमूत्र के प्रयोग से हमें हर वह वस्तु
बनानी होगी जो मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी हो।

गोमूत्र का उपयोग दवाईयों के बनाने में भी हो रहा है और गोमूत्र से बनी दवाईयां
कई असाध्य रोगों को ठीक करने में भी कामयाब हुई हैं।

जरूरत इस चीज़ की है कि इन वस्तुओं के बनाने में उद्योपतियों को आगे आना चाहिए।

गोबर और गोमूत्र की हर गांव और हर घर से खरीद करनी चाहिए ताकि गाय पालने
वालों को इतना लाभ हो कि गाय-पालक और अधिक गाय खरीदें और बूढ़ी और दूध ने देने वाली गायों को अपने संरक्षण में रखेंं।

उससे उन्हें इतना लाभ हो कि वह अपनी किसी भी गाय को किसी भी मूल्य पर देने
को सहमत ही न हो।

उद्योगपतियों के द्वारा थोड़ा या अधिक दान गौशाला में देने से काम नहीं चलेगा,

उन्हें ऐसे उद्योग, जो लाभकारी हों, लगाकर गाय के और उसके उत्पादों की महिमा
को आम नागरिक के सामने लाना होगा।

गाय पालकों को गाय के गोबर और गोमूत्र बेचकर इतना धन मिले कि कोई गाय
पालक और किसान अपनी गाय को पशुबाजार में ले जाने की आवश्यकता ही न समझे।