मंगलवार, 6 जून 2017

गो-महिमा भाग-3

गो- महिमा भाग-०३

श्रीमद्भागवत में भी गो की महिमा का बहुत वर्णन किया गया है, उस समय गोवंश कितना समृद्ध था, इस बात की भी चर्चा भागवत के कतिपय प्रसंगों में की गयी है | गोकर्णजी का प्राकट्य गौ से ही है और गाय के उदर से उत्पन्न गोकर्ण महात्मा इतने प्रभावशाली हुए कि भागवत के माहात्म्य में इनकी उपमा श्रीरामजी से की गयी | जैसे भगवान श्रीराम ने समस्त अवधवासियों को अपने नित्यधाम की प्राप्ति करायी, उसी प्रकार महात्मा गोकर्ण की वाणी के प्रसाद से भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ और भगवान द्वारा भागवत के समस्त श्रोताओं को नित्य धाम की प्राप्ति करायी गयी | भागवत के प्रधान वक्ता श्रीशुकदेवजी महाराज भिक्षा में गोदुग्ध ग्रहण करते हैं-ऐसा श्रीमद्भागवत तथा अन्यान्य ग्रन्थों में वर्णित है |
श्रीमद्भागवत में गाय की बहुत बड़ी महिमा वर्णित है | एक गोसेवक भक्त को केवल गोसेवा से भगवान की गोचारणलीला दर्शन एवं नित्य लीला में प्रवेश मिला |
जबतक हमारी बुद्धि में यह बात बनी रहेगी कि गाय पशु है तब तक ठीक से सेवा नहीं बन पायेगी | सेवा सदा सेव्य की होती है, उपासना सदैव उपास्य की होती है और उपासना-सेवा तब संभव है, जब सेव्य के प्रति-उपास्य के प्रति हमारी बुद्धि बन जाय कि वह साक्षात भगवान है | गाय ही साक्षात भगवान है, यह बात हमारे ध्यान में ई जाय और ऐसा ध्यान करके गोसेवा की जाय तो गोसेवा से भगवत्प्राप्ति हो जाय | लेकिन हमारे गाय के प्रति अपराध बनते जाते हैं, इसका कारण हमारी गाय के प्रति पशुबुद्धि बनी रहती है |

गो - महिमा भाग - 02

गो- महिमा भाग -०२

इसलिए गाय की रक्षा से,गाय की सेवा से,गाय की भक्ति से और गव्य पदार्थों के सेवन से मनुष्य में सात्विक विचार तथा सात्विकता आती है | सारी समस्याओं का समाधान गोरक्षा से संभव है | बिना गोसेवा एवम् गोरक्षा के विश्वमंगल संभव नहीं | जिस दिन गाय का एक बूंद रक्त भी धरती पर नहीं गिरेगा, उस दिन सारी समस्याओं का उन्मूलन हो जायेगा | सारे विश्व का कल्याण हो जायेगा | यही समझाने को और सिद्धांत की बात है | कहते हैं-
यत्र गावः प्रसन्नाः स्युः प्रसन्नास्तत्र सम्पदः |
यत्र गावो विषण्णाः स्युर्विषण्णास्तत्र सम्पदः ||

जहाँ गायें प्रसन्न रहती हैं, वहाँ समस्त सम्पदायें प्रसन्न होकर प्राप्त रहती हैं और जहां गायें दुःखी रहती हैं, वहाँ सम्पदायें दुःखी होकर लुप्त हो जाती हैं | वास्तव में हम गाय के बारे में विचार तो बहुत अधिक करते हैं | कोई हमें गाय के बारे में वक्तव्य देने को कहे तो हम व्याख्यान दे सकते हैं, कोई बहुत बड़ा लेख व्यवस्थित रूप से लिखने को कहे तो लेख भी लिख सकते हैं, लेकिन ईमानदारी से हमारे मन द्वारा गाय की भक्ति नहीं हो पाती | फिर हमारा जो कहा सुना है उसकी कोई महिमा नहीं है, यह तो हम नहीं कह सकते हैं, लेकिन यह एक तरह से मिथ्याचार है | इसलिए हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने कहा था कि 'देखो पण्डितजी! जिस दिन एक भी गाय नहीं रखोगे, गाय की सेवा नहीं करोगे, उस दिन गाय के बारे में एक भी वाक्य बोलने के अधिकारी नहीं रहोगे |' इसलिए गाय के बारे में बोलने के अधिकारी बने रहें, इसके लिए चाहे किसी काम में कमी आ जाय लेकिन गोसेवा में कमी नहीं आनी चाहिए | चाहे जैसा संकट भी सहन करके गाय की सेवा करनी चाहिए | पुराणों में गोमहिमा है, स्मृतियों में गोमहिमा है, संतों की वाणी में गोमहिमा है, आवश्यकता है कि वेद से लेकर पुराण, आगम, इतिहास, ग्रन्थ और सन्तों की वाणियाँ- इनका विस्तृत, गहन अध्ययन हो और एक गम्भीर चिन्तन विचारपूर्वक समस्त उद्धरणों को एक जगह संकलित किया जाय, संग्रहीत किया जाय, उनकी व्याख्यायें भी प्रस्तुत की जायें तो हम समझते हैं कि एक विशाल ग्रन्थ तैयार हो जायेगा | इतनी गाय की महिमा है |

गो-महिमा भाग - 01

गो - महिमा  भाग  -०१

जिनका अन्तःकरण अतिशय पवित्र हो जाता है वह गो तत्व को समझ सकते हैं । अत्यन्त पवित्र का तात्पर्य है-  त्रिगुण अर्थात सत्व,  रज तथा तम तीनों से रहित चित्त और बुद्धि गुणातीत हो जाए तो वह पदार्थ की महत्ता को जाना जा सकता है । सनातन धर्म क्या है ? इसके सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में पर्वतश्रेष्ठ मैनाक श्री हनुमान जी को सनातन धर्म का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि -

#कृते_च_प्रति_कर्त्तव्यमेष_धर्मस्सनातनः ।।

अर्थात्  जिसने हमारे प्रति किञ्चित भी उपकार किया है, उसके प्रति सदा कृतज्ञ रहना , यही सनातन धर्म है । भगवान की सृष्टि में गाय के जैसा कोई कृत अन्य प्राणी नहीं है । प्रेम को स्वीकार करने वाला तथा उपकार का ऐसा उत्तर देने वाला गाय के जैसा कोई प्राणी नही है ।

भगवान् की सृष्टि  में  गाय जैसा कोई  कृतज्ञ प्राणी नहीं है ।  प्रेम को स्वीकार  करने  वाला तथा    उपकार का ऐसा उत्तर देने वाला गाय के जैसा कोई प्राणी नहीं है  अड़सठ  करोड़ तीर्थ एवं तैंतीस करोड़ देवताओं का चलता फिरता विग्रह गाय  है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर गाय का जो उपकार है , उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । भगवान् के सम्बन्ध में यह बात कही जाती है कि शुक,  सनकादि शेष  और  शारदा भी प्रभु के गुणों का सांगोपांग वर्णन करें,  यह संभव नहीं , उन श्री भगवान के चरणों में कोई प्रार्थना करे कि प्रभु आप अपनी उपास्य देवता गौ माता के गुणों का वर्णन करें ,उनके उपकारों का वर्णन   तो सम्भवतया भगवान् भी गौ माता के चरण रज को मस्तक पर चढ़ाकर अश्रुपूरित नेत्रों से मूक रहकर ही गौ माता की महिमा का वर्णन करेंगे,  ऐसी गौ माता की महिमा है ।

गौ महिमा के विषय में कहा भी गया है  -

आगे गाय , पाछे गाय इत गाय उत गाय ।

गायन में नन्दलाल बसिबौहि  भावै ।।

गायन के संग धावे, गायन में  सचु पावै ।

और गायन की खुर रेणु अंग लपटावै ।।

गायन तैं ब्रज छायो , बैकुण्ठउँ बिसरायो ।

गायन के हेतु कर गिरि लै उठावै ।।

छीतस्वामी गिरिधारी विठ्ठलेश वपुधारी ।

ग्वारिया को भेषधारि गायन में आवे ।।

अर्थात् हम गाय के प्रति जैसा होना चाहिए,  वैसा कोई उपकार नहीं कर पा रहे हैं । गाय ही हमारे प्रति उपकार कर रही है।  अपने तन,  मन,  प्राण से अपने रोम-रोम से अपने दूध,  दही,  घृत,  मूत्र एवं गोमय के द्वारा केवल अपनी उपस्थिति से अपने स्वांश- प्रश्वास के द्वारा,  अपने खुर की  रज से,  गोवंश को छूकर प्रवाहित होने वाली वायु से  जो सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने वाली है , ऐसी गाय का कितना उपकार है समाज पर,  जड़- चेतन सब जीवो पर , उसे कहा नहीं जा सकता ।

गाय के प्रति हम कृतज्ञ हो,  यही सनातन धर्म है ।  हमारी सामान्य सेवा से गाय कृतज्ञ होती है । यत्किञ्चित्  गाय की सेवा बन जाए तो उससे गौमाता इतनी सन्तुष्ट होती है,  इतनी कृपा करती है कि वह अपने सेवक के प्रति कृतज्ञ रहती है । गाय धर्म का प्रतीक है क्योंकि गाय के जैसी कृतज्ञता मनुष्य में भी नहीं है । गाय के प्रति कृतज्ञ होना यही सनातन धर्म है । आज जितनी भी भयंकर - भयंकर समस्याएं हैं,  उन सब का मूल कारण है - रजोगुण और तमोगुण की वृद्धि ।  सात्विकता कहीं दिखाई नहीं पड़ती । भगवान् ने  अपनी सृष्टि में सर्वाधिक सत्वगुण को गाय के भीतर प्रतिष्ठित किया है ।  गाय सात्विकता का आधार एवं पूज्य है,  इसलिए गाय की रक्षा से,  गाय की सेवा से,  गाय की भक्ति से और गव्य पदार्थों के सेवन से मनुष्य में सात्विक विचार तथा सात्विकता आती है।

।। जय श्री  राम ।।

शनिवार, 3 जून 2017

गौहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में दिए जा रहे कुतर्कों की समीक्षा

गौहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में दिए जा रहे कुतर्कों की समीक्षा

केंद्र सरकार द्वारा गौ हत्या पर पाबन्दी लगाने एवं कठोर सजा देने के निर्देश पर मानो सेक्युलर जमात की नींद ही उड़ गई है। एक से बढ़कर एक कुतर्क गौ हत्या के समर्थन में कुतर्की दे रहे है। केरल में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने सरेआम गौ वध कर अपने आपको सेक्युलर सिद्ध करने का प्रयास किया। हमारे देश में एक जमात है. इसके अनेक मुखौटे है। कभी यह अपने आपको बुद्धिजीवी, कभी मानवाधिकार कार्यकर्ता, कभी एक्टिविस्ट, कभी समाज सेवी, कभी पुरस्कार वापसी गैंग आदि के रूप में सामने आता हैं। गौहत्या के पक्ष में एक से बढ़कर एक कुतर्क दिए जा रहे है।

इनके कुतर्कों की समीक्षा करने में मुझे बड़ा मजा आया। आप भी पढ़े।

कुतर्क नं  1. गौ हत्या पर पाबन्दी से देश में लाखों व्यक्ति बेरोजगार हो जायेगे जो मांस व्यापर से जुड़े है।

समीक्षा- गौ पालन भी अच्छा व्यवसाय है। इससे न केवल गौ का रक्षण होगा अपितु पीने के लिए जनता को लाभकारी दूध भी मिलेगा। ये व्यक्ति गौ पालन को अपना व्यवसाय बना सकते हैं। इससे न केवल धार्मिक सौहार्द बढ़ेगा अपितु सभी का कल्याण होगा।

कुतर्क नं  2. गौ मांस गरीबों का प्रोटीन है। प्रतिबन्ध से उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव होगा।

समीक्षा- एक किलो गौ मांस 150 से 200 रुपये में मिलता हैं जबकि इतने रुपये में 2 किलो दाल मिलती हैं। एक किलो गौमांस से केवल 4 व्यक्ति एक समय का भोजन कर सकते हैं जबकि 2 किलो दाल में कम से कम 16-20 आदमी एक साथ भोजन कर सकते हैं। मांस से मिलने वाले प्रोटीन से पेट के कैंसर से लेकर अनेक बीमारियां होने का खतरा हैं जबकि शाकाहारी भोजन प्राकृतिक होने के कारण स्वास्थ्य के अनुकूल हैं। ऐसा वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है।

कुतर्क नं  3. गौ मांस पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है क्यूंकि यह उनके भोजन का प्रमुख भाग है।

समीक्षा- मनुष्य स्वाभाव से मांसाहारी नहीं अपितु शाकाहारी है। वह मांस से अधिक गौ का दूध ग्रहण करता है। इसलिए यह कहना की गौ का मांस भोजन का प्रमुख भाग है एक कुतर्क ,मात्र है। एक गौ अपने जीवन में दूध द्वारा हज़ारों मनुष्यों की सेवा करती है, जबकि मनुष्य इतना बड़ा कृतघ्नी है कि उसे सम्मान देने के स्थान पर कसाइयों से कटवा डालता है।

कुतर्क नं  4. अगर गौ मांस पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ जमीन पर उगने वाली सारी घास को खा जाएगी जिससे लोगों को घास भी नसीब न होगी।

समीक्षा- गौ घास खाने के साथ साथ गोबर के रूप में प्राकृतिक खाद भी देती है। जिससे जमीन की न केवल उर्वरा शक्ति बढ़ती है। अपितु प्राकृतिक होने के कारण उसका कोई दुष्परिणाम नहीं है। प्राकृतिक गोबर की खाद डालने से न केवल धन बचता है। अपितु उससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। साथ में ऐसी फसलों में कीड़ा भी कम लगता है, जिनमें प्राकृतिक खाद का प्रयोग होता है। इस कारण से महंगे कीटनाशकों की भी बचत होती है। साथ में विदेश से महंगी रासनायिक खाद का आयात भी नहीं करना पड़ता। बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ को प्राकृतिक खाद के स्रोत्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

कुतर्क नं  5. गौहत्या पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों के अधिकारों का अतिक्रमण है।

समीक्षा- बहुसंख्यक के अधिकारों का भी कभी ख्याल रखा जाना चाहिए। इस देश में बहुसंख्यक भी रहते है। गौहत्या से अगर बहुसंख्यक समाज प्रसन्न होता है तो उसमें बुराई क्या है।

कुतर्क नं  6. गौहत्या करने वाले को 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है जबकि बलात्कारी को 7 वर्ष का दंड है। क्या गौ एक नारी के शील से अधिक महत्वपूर्ण हो गई?

समाधान- हम तो बलात्कारी को उम्रकैद से लेकर फांसी की सजा देने की बात करते है। आप लोग ही कटोरा लेकर उनके लिए मानव अधिकार के नाम पर माँफी देने की बात करते है। सबसे अधिक मानव अधिकार के नाम पर रोना एवं फांसी पर प्रतिबन्ध की मांग आप सेक्युलर लोगों का सबसे बड़ा ड्रामा है।

कुतर्क नं  7. गौहत्या के व्यापर में हिन्दू भी शामिल है।

समाधान- गौहत्या करने वाला हत्यारा है। वह हिन्दू या मुसलमान नहीं है। पैसो के लालच में अपनी माँ को जो मार डाले वह हत्यारा या कातिल कहलाता है नाकि हिन्दू या मुस्लमान। सबसे अधिक गोमांस का निर्यात मुस्लिम देशों को होता है। इससे हमारे देश के बच्चे तो दूध के लिए तरस जाते है और हमारे यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है। इन कसाईयों की योजना हरे भरे भारत देश को रेगिस्तानी देश बनाना है।

कुतर्क नं  8.  अगर गौ से इतना ही प्रेम है तो उसे सड़कों पर क्यों छोड़ देते है।

समाधान- प्राचीन काल में राजा लोग गौ को संरक्षण देने के लिए गौशाला आदि का प्रबंध करते थे जबकि आज की सरकारे सहयोग के स्थान पर गौ मांस के निर्यात पर सब्सिडी देती है। विडंबना देखिये मुर्दों के लिए बड़े बड़े कब्रिस्तान बनाने एवं उनकी चारदीवारी करने के लिए सरकार अनुदान देती है, जबकि जीवित गौ के लिए गौचर भूमि एवं चारा तक उपलब्ध नहीं करवाती। अगर हर शहर के समीप गौचर की भूमि एवं चारा उपलब्ध करवाया जाये तो कोई भी गौ सड़कों पर न घूमे। खेद हैं हमारे देश में अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में मुर्दों की गौ माता से ज्यादा औकाद बना दी गई है। गावों आदि में पशुओं के चरने के लिए जो गोचर भूमि होती थी। या तो उस पर अवैध कब्ज़ा हो गया अथवा खेती की जाने लगी। उस भूमि को दबंगों से खाली करवाकर गौ के चरने के लिए प्रयोग किया जाता तो गौ सड़कों पर नहीं घूमती।

कुतर्क नं  9. गौ पालन से ग्रीन हाउस गैस निकलती है जिससे पर्यावरण की हानि होती हैं।

समाधान- यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मांस भक्षण के लिए लाखों लीटर पानी बर्बाद होता है। जिससे पर्यावरण की हानि होती है। साथ में पशुओं को मांस के लिए मोटा करने के चक्कर में बड़ी मात्र में तिलहन खिलाया जाता है। जिससे खाद्य पदार्थों को अनुचित दोहन होता है। शाकाहार पर्यावरण के अनुकूल है और मांसाहार पर्यावरण के प्रतिकूल है। कभी पर्यावरण वैज्ञानिकों का कथन भी पढ़ लिया करो?

कुतर्क नं  10. गौमांस पर प्रतिबन्ध भोजन की स्वतंत्रता पर आघात है। हम क्या खाये क्या न खाये आप कौन होते है यह सुनिश्चित करने वाले?

समाधान- मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है मगर सामाजिक नियम का पालन करने के लिए परतंत्र है। एक उदहारण लीजिये आप सड़क पर जब कार चलाते है। तब आप यातायात के सभी नियमों का पालन करते है अन्यथा दुर्घटना हो जाएगी। आप कभी कार को उलटी दिशा में नहीं चलाते और न ही कहीं पर भी रोक देते है अन्यथा यातायात रुक जायेगा। यह नियम पालन मनुष्य की स्वतंत्रता पर आघात नहीं है अपितु समाज के कल्याण का मार्ग है। इसी नियम से भोजन की स्वतंत्रता का अर्थ दूसरे व्यक्ति की मान्यताओं को समुचित सम्मान देते हुए भोजन ग्रहण करना है। जिस कार्य से समाज में दूरियां, मनमुटाव, तनाव आदि पैदा हो उस कार्य को समाज हित में न करना चाहिये। जो आप सोचे वह सदा ठीक हो ऐसा कभी नहीं होता।

कुतर्क नं 11- प्राचीन काल में गौ की यज्ञों में बलि दी जाती थी और वेदों में भी इसका वर्णन मिलता है।

समाधान- इस भ्रान्ति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण है। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान मानना, द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण, महीधर आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाईयों, मुसलमानों आदि द्वारा माँस भक्षण के समर्थन में वेदों कि साक्षी देना, चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जाँचें बार बार रटना।
वेदों में मांस भक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। अनेक वेद मन्त्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणि को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। जैसे

हे मनुष्यों ! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं - यजुर्वेद 1/1

जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद 40/7 

हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं । तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो।- अथर्ववेद 6/140/2

वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए- अथर्ववेद 8/6/23

निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद 10/1/29

इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया है कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध है।

इन कुतर्कों का मुख्य उद्देश्य युवा मस्तिष्कों को भ्रमित करना है।
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शुक्रवार, 2 जून 2017

गोस्वामी तुलसीदासजी की दृष्टि मे गोसेवा और उसका महत्व-

गोस्वामीतुलसीदासजी की दृष्टि
मे गोसेवा और उसका महत्व-

गोस्वामीजी ने अपने सम्पूर्ण साहित्य मे गौ की निरंतर चर्चा की है। वे काशी को भी गाय का रूप मानते हुए
बड़ी सुन्दर पद रचना करते हुए विनय पत्रिका से
            लिखते है -

सेइअ सहित सनेह देह भरि,
कामधेनु कलि कासी।
समनि सोक संताप पाप रूज
सकल सुमंगल रासी।।
(और भी रचना है-)

इस पद में गंगा के अनुकूल गाय को उत्तर की और
मुख करके खड़ा किया गया है,उसका गलकम्बल
और मुख वरूणा नदी के पास और पूँछ अस्सी के
                पास माना गया है।

मुख्य काशी वरूणा और अस्सी के बीच मानी जाती है    
      इसलिए इसका दूसरा नाम वाराणसी भी है।

इस पद का एक एक अक्षर बहूमूल्य तथा
              निरन्तर माननीय है।

यद्यपि इसमें सभी काशी के मुख्य देवताओ और
पवित्र तीर्थो का वर्णन संनिविष्ट है,परन्तु उसका
मुख्य तत्व है गौ- दुग्ध जिसे ज्ञानियो के समान
सामान्य प्राणी भी समान रूप से परमसुख दायक
     निर्णय के रूप मे प्राप्त कर लेता है-

लहत परमपद पय पावन
जेहि चहत प्रपंच उदासी।।

मानस मे ज्ञानदीपक का मुख्य आधार
            श्रद्धारूप गौ ही है।

उस प्रकरण मे गोस्वामीजी के वेदांत ज्ञान सम्बन्धी
     श्रम का अनुमान होता है। वे वहाँ लिखते है-

सात्तिवक श्रद्धा धेनु सुहाई
जौं हरि कृपा ह्रदय बस आई।।
रा.च.मा.7/117/9

गुरुवार, 1 जून 2017

हाँ, वेद में गो हत्यारे को मारने का आदेश है:

हाँ, वेद में गो हत्यारे को मारने का आदेश है:

आजकल गो मांस खाने, न खाने को लेकर तथाकथित साहित्यकार, मानव अधिकारवादी, प्रगतिशील और कांग्रेस समर्थक राजनैतिक लोग प्रतिदिन ही शोर करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि इनको गाय, घोड़े से कुछ भी लेना देना नहीं है, इनका उद्देश्य हिन्दू विरोध है।

इस देश में गत साठ वर्षों तक जो लोग सत्ता के साथ रहे और वहाँ से लाभ उठाते रहे, आज उनका सत्ता सुख छिन गया तो चिल्ला रहे हैं। यदि इन लोगों के अन्दर थोड़ी भी संवेदनशीलता या मनुष्यता होती तो जो कुछ आज मुस्लिम देशों में हो रहा है, उसका विरोध करने का साहस अवश्य करते।

मूल रूप से ये लोग पाखण्डी हैं, इनको हिन्दू विरोध करने का आर्थिक लाभ मिलता था, मोदी सरकार के आने से वह बन्द हो गया, इस कारण इनका यह पीड़ा-प्रदर्शन उचित ही है। हिन्दू विरोध के नाम पर राष्ट्रद्रोह करना इनका स्वभाव बन चुका है।

जो लोग ऐसा कहते हैं कि हिन्दू लोग गौ की तुलना में मनुष्य का मूल्य नहीं समझते, किसी ने किसी जानवर को मार दिया तो क्या हो गया, जानवर का मनुष्य के सामने क्या मूल्य है? संसार के सभी प्राणी मनुष्य के लिए ही बने हैं। उन्हें मारने-खाने में कोई अपराध नहीं होता।

संसार की सभी वस्तुयें मनुष्य के उपयोग के लिये बनी हैं, इसका यह अभिप्राय तो नहीं हो सकता कि आप उन्हें नष्ट कर दें। संसार के प्राणी भी मनुष्य के लिये हैं तो इनको मारकर खा जाना ही तो एक उपयोग नहीं है। पहली बात, जो भी संसार की वस्तुयें और प्राणी हैं, वे सभी मनुष्यों की साझी सपत्ति हैं, सबके लिये उनका उपयोग होना चाहिए।

सबका हित सिद्ध होता हो, ऐसा उपयोग सबको करना उचित है। संसार की वस्तुओं का श्रेष्ठ उपयोग मनुष्य की बुद्धिमत्ता की कसौटी है। कोई मनुष्य घर को आग लगाकर कहे कि लकड़ियाँ तो मेरे जलाने के लिये ही हैं। लकड़ियाँ जलाने के काम आती है, परन्तु घर बनाने के भी काम आती हैं, उनका यथोचित उपयोग करना मनुष्य का धर्म है।

कोई भी मनुष्य किसी का अहित करके अपना हित साधना चाहता है तो उसको ऐसा करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। समाज में व्यक्तिगत आचरण की पूर्ण स्वतन्त्रता है, परन्तु सामाजिक परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति को समाज के नियमों के अधीन चलना होता है।

जो लोग गाय का मांस खाने को अधिकार मानते हैं, वे मनुष्य का मांस खाने को भी अधिकार मान सकते हैं। समाज में कोई ऐसा करता है तो उसे अपराधी माना जाता है, उसे दण्डित किया जाता है, जैसा निठारी काण्ड में हुआ है। वैसे ही गाय भारत में हिन्दू समाज में न मारने योग्य कही गई है।

आप कानून व नियम का विरोध करके गो मांस खाने को अपना अधिकार बता रहे हैं। एक वर्ग-बहुसंयक वर्ग जब गौ हत्या की अनुमति नहीं देता, तब यदि आप ऐसा करते हैं तो देश और समाज से द्रोह करना चाह रहे हैं।

ऐसी परिस्थिति में जब एक वर्ग नियम को मानने से इन्कार करता है तो दूसरा वर्ग भी नियम तोड़ने लगता है, जैसा कश्मीर में हुआ, यदि गोहत्या करना, गोमांस खाना इंजीनियर रशीद का अधिकार है तो गाय की रक्षा करने का और गोहत्यारे को दण्डित करना भी हिन्दू का अधिकार है। ये दोनों स्थिति समाज में अराजकता उत्पन्न करने वाली हैं, समाज के हित में नहीं है। हमें समाज के हित को सर्वोपरि रखना होगा।

यदि गोहत्या करके एक अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है तो दूसरा सूअर को लेकर आपकी भावनाओं को आहत करता है। यह संघर्ष निन्दनीय है। जो लोग गोहत्या के पक्षधर हैं, वे अपने भोजन की चिन्ता में पूरे समाज के भोजन पर संकट उत्पन्न कर रहे हैं। गाय का मांस तो कुछ लोगों की आवश्यकता है, परन्तु गाय का दूध पूरे समाज की आवश्यकता है। यह मांस खाने वालों की भी आवश्यकता है। इन लोगों के मांस खाने से समाज में आज दूध का भयंकर संकट उत्पन्न हो गया है।

आपको अपने परिवार में दूध चाहिए या नहीं, छोटे बच्चों को दूध चाहिए, बड़ों को, रोगियों को दूध चाहिए। घर में दूध, दही, मक्खन, घी, मिठाई, मावा, खीर, पनीर आदि में प्रतिदिन जितने दूध की आवश्यकता है, दूध का उत्पादन उसकी अपेक्षा बहुत थोड़ा हो रहा है, इसीलिये दूध, दही, मावा, पनीर, मिठाई में सब कुछ नकली आ रहा है। दूध से बनी हर वस्तु में आज मिलावट है, क्योंकि गौहत्या के निरन्तर बढ़ने से गाय, भैंस आदि पशु घट गये हैं।

यदि यही क्रम जारी रहा तो आपके लिये सोयाबीन का आटा घोलकर पीने के अतिरिक्त कोई उपाय ही नहीं बचेगा। गोमांस खाने और गोमांस के व्यापार के कारण देश गहरे संकट की ओर जा रहा है। भोजन में गोदुग्ध के पदार्थों को निकाल दिया जाय तो भोजन में कुछ बचता नहीं है।

हम समझते हैं कि कारखानों, उद्योगों से समृद्धि आती है, समृद्धि का वास्तविक आधार पशुधन है। मनुष्य की जितनी आवश्यकताओं की पूर्ति पशुओं से प्राप्त होने वाली वस्तुओं से होती है, उतनी अन्य पदार्थों से नहीं होती। जीवित पशु हमें अधिक लाभ पहुँचाते हैं, मरकर तो पहुँचाते ही हैं। स्वयं मरे पशु का उपयोग कम नहीं अतः पशुवध की आवश्यकता नहीं है। गोदुग्ध और उससे बने पदार्थ जहाँ मनुष्य के लिये बल, बुद्धि के बढ़ाने वाले होते हैं, वहाँ मांस तमोगुणी भोजन है,

इसलिये महर्षि दयानन्द ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि गौ आदि पशुओं के नाश से राजा और प्रजा का भी नाश होता है। इस भारत के नाश के लिये अंग्रेजों ने हमारी समृद्धि के दो सूत्र समझे थे और उनका पूर्णतः नाश किया था।

प्रथम हमारी शिक्षा, हमारे विचार और चिन्तन के उत्कर्ष का आधार थी, उसे नष्ट किया तथा दूसरा पशुधन विशेष रूप से गाय जो हमारी समृद्धि का मूल थी, उसका नाश कर इस देश को दरिद्र बना गये। उन्हीं के दलालों के रूप में जो लोग इस देश में उन्हीं से पोषण पाते हैं, उन्हीं के इशारे पर काम करते हैं, उन्हीं का षड़यन्त्र है। वे गोमांस खाने  जैसी बातें उठाकर विवाद उत्पन्न करते हैं, विदेशों में देश की छवि खराब करते हैं। गाय हमारे बीच हिन्दू-मुसलमान की पहचान नहीं है, गाय तो सब की है। गाय उपयोगिता की दृष्टि से दूध न देने पर भी उपयोगी है। उसके गोबर से खाद और गोमूत्र से औषध का निर्माण होता है। पिछले दिनों गाय पर किये जा रहे अनुसन्धानों ने सिद्ध कर दिया है कि गाय न केवल हमारी भोजन की समृद्धि को अपने दूध से बढ़ाती है, अपितु खेती की उर्वरा-शक्ति का संरक्षण भी गोबर की खाद से करती है। गोमूत्र से अमेरिका जैसे देश केंसर की दवा का निर्माण करते हैं।

महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में गाय की रक्षा के लिये बहुत प्रयत्न किया था। स्वामी जी ने गोहत्या के विरोध में करोड़ों लोगों के हस्ताक्षर कराकर महारानी विक्टोरिया को भेजने और गोहत्या बन्द करने का आन्दोलन चलाया था।

स्वामी जी ने गोकरुणानिधि में एक गाय के जीवन भर के दूध से कितने लोगों का पालन-पोषण होता है तथा एक गाय के मांस से एक बार में कितने लोगों का पेट भरता है, इसकी तुलना करके गौ का अर्थशास्त्र समझाया था। गाय को हिन्दुओं ने पवित्र माना, यह केवल एक धार्मिक भावना का प्रश्न नहीं है। आज गाय के दूध के गुणों के कारण भारतीय गायों की नस्ल का संरक्षण ब्राजील और डेन्मार्क जैसे देशों में किया जा रहा है। वहाँ गौ संवर्धन का कार्य बड़े व्यापक स्तर पर किया जा रहा है।

ऐसी परिस्थिति में हमारे देश में यह विवाद निन्दनीय और चिन्ताजनक है। भारतीय गायों की तुलना में विदेशी नस्ल की गायों के दूध में कितना विष है, इसका बहुत बड़ा अनुसन्धान हो चुका है।

भारतीय गाय आज समाप्त होने के कगार पर है। ऐसी परिस्थिति में यह विवाद स्वयं प्रेरित नहीं कहा जा सकता। जो सामाजिक ताने-बाने को तोड़कर राष्ट्र की प्रगति को रोकना चाहते हैं, यह ऐसे लोगों का काम है।

भोजन की स्वतन्त्रता के नाम पर जो कानून को तोड़ना चाहते हैं, उन्हें यह भी अवश्य ही ज्ञात होगा कि स्वतन्त्रता की बात तो तब आती है, जब आपके पास कोई वस्तु  सुलभ हो। यदि कोई यह समझता है कि उसे गोमांस खाने की स्वतन्त्रता और अधिकार है तो क्या गोमांस खाने वालों के अधिकार से गोदुग्ध पीने वालों का अधिकार समाप्त हो जाता है।

गोमांस और गोदुग्ध के अधिकार में गोमांस खाने की बात करना, दिमागी दिवालियेपन की पहचान है। नई वैज्ञानिक खोजों ने सिद्ध किया है कि प्राणियों की हिंसा और निरन्तर बढ़ रही क्रूरता से पृथ्वी का पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। प्राणियों की हत्या करने का कार्य नई तकनीक और विज्ञान के प्रयोग से बहुत बड़े स्तर पर चलाया जा रहा है, उसमें क्रूरता भी उतनी ही बढ़ गई है। मनुष्य चमड़े के लोभ में पशुओं के गर्भस्थ शिशुओं की हत्या करता है और भोजन के नाम पर पशुओं को यातनायें देता है। इन यातनाओं से मनुष्य का स्वभाव क्रूर होता है। आजकल हमारे समाज में बच्चों से लेकर बड़ों तक, ग्राम से नगर तक सबके स्वभाव में असहिष्णुता और क्रूरता का समावेश हुआ है, उसका मुख्य कारण हमारे व्यवहार में आई हुई हिंसा है। जिन धर्मों में दया और संयम का स्थान नहीं है, उनको धर्म कहना ही उचित नहीं है, अहिंसा और संयम के बिना समाज में कभी भी मर्यादाओं की रक्षा नहीं की जा सकती।

गौ आदि प्राणियों के रक्षण और पालन से समृद्धि के साथ सद्गुणों का भी समावेश होता है। कुछ लोग गाय को माता कहने का मजाक बनाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे लोग नहीं जानते कि इन शदों का भावनात्मक मूल्य क्या है?

भारतीय जब भी संसार के पदार्थों के गुणों को समझते हैं और उनसे लाभ उठाते हैं, उनके साथ आत्मीय भाव विकसित करते हैं। जिनके साथ मनुष्य का आत्मीय भाव होता है, मनुष्य उनकी रक्षा करता है, उन वस्तुओं से प्रेम करता है। हिन्दू भूमि को माता कहता है, गाय को माता कहता है, अपना पालन-पोषण करने वाली धरती आदि को माता कहता है। सबन्धों में बड़े गुरु, राजा आदि की पत्नी को माता कहता है। यह शब्द समान और उसके प्रति कर्त्तव्य का बोध कराने वाला है। जो लोग गाय का मांस खाने को अपना अधिकार बताते हैं और तर्क देते हैं कि ईश्वर ने पशुओं को मनुष्य के खाने के लिये बनाया है, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या सूअर को ईश्वर ने न बनाकर क्या मनुष्य ने बनाया है और सूअर भी यदि ईश्वर ने बनाया है तो क्या ईश्वर अपवित्र वस्तु व प्राणी बनाता है? वस्तु व प्राणियों की पवित्रता-अपवित्रता मनुष्य की अपेक्षा से होती है। परमेश्वर के लिये सारी रचना पवित्र ही है।

जहाँ तक मनुष्य अपने को पवित्र समझें तो उन्हें योग दर्शन की पंक्ति का स्मरण करना चाहिए- मनुष्य का शरीर जन्म से मृत्यु तक अपवित्रता का पर्याय है। फिर कोई प्राणी रचना से कैसे पवित्र-अपवित्र है, परमेश्वर की साी रचना पवित्र है। मनुष्य अपने ज्ञान, रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार वर्गीकरण कर लेता है। आज गौ को बचाने के लिए गोमांस के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता है। विदेशों में, विशेषकर खाड़ी के देशों को मांस का निर्यात होता है, मांस के व्यापारी धन के लोभ में अधिक-अधिक गोमांस का निर्यात कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। राज्य व्यवस्था में गोहत्या राज्य का विषय होने से प्रशासन में एक मत नहीं हो पा रहा है। भाजपा शासित राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबन्ध और इस अपराध के लिये दण्ड विधान है, दूसरे राज्यों में नहीं। इस कार्य को करने की आवश्यकता है।

अब एक बात सोचने की है, गोहत्यारे को मृत्युदण्ड बयान विवादित कैसे है? वेद में तो हत्यारे को मारने का विधान स्पष्ट है, विवादित बयान उनका हो सकता है जो लोग वेद में गो हत्या करने का विधान बताते हैं। वेद में हत्या का विधान होने से गो हत्यारे की हत्या तो हो नहीं जायेगी, क्योंकि भारत का शासन वेद के नियम से तो चलता नहीं है। यह तो भारत के संविधान से चलता है।

कुरान में लिखा है कि काफिर को मारने वाले को खुदा जन्नत देता है, तो क्या लिखा होने से भारत में इसे लागू कर देंगे? वेद और कुरान में जो लिखा है, लिखा रहने दें, इससे परेशान होने की क्या आवश्यकता है,

वेद तो कहता है- यदि कोई तुहारे गाय, घोड़े, पुरुष की हत्या करता है तो सीसे की गोली से मार दो।

मन्त्र इस प्रकार है- यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्। तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नासो अवीरहा।

– अथर्ववेद 1/16/4

संभार
डॉ धर्मवीर