गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गोसेवा - भगवत्सेवा

गोसेवा - भगवत्सेवा

जिन क्षेत्रों में अधिक गोसमुदाय होता है, वहाँ रोग कम पनपते हैं। जिस स्थान पर गाय, बैल, बछड़ा आदि मूत्र का विसर्जन करते हैं, उस स्थान पर दीमक नहीं लगती। गाय के गोबर की खाद सभी खादों से अधिक उपजाउ और भूमि के लिये रसवर्धक होती है। बरसात के दिनों में फसलरहित खेतों में गायों के अधिक घूमने-चरने से उन खेतों में रबी की फसल अधिक पैदा होती है और वह फसल रोगरहित होती है। गोमूत्र से जो औषधि बनती है, वह उदर रोगों की अचूक दवा होती है। खाली पेट थोड़ा-सा गोमूत्र पीने से बीमारियाँ नहीं होती हैं। गोमूत्र में आँवला, नींबू, आम की गुठली तथा बबूल की पत्ती इत्यादि के गुण होते हैं। नींबू रस पेट में जाकर पेट की गंदगी को चुनकर पेट को साफ करता है, वैसे ही गोमूत्र से मुँह, गला एवं पेट शुद्ध होता है।
जिस भूमि पर गायें नहीं चरतीं, वहाँ पर स्वाभाविक ही घास का पैदा होना कम हो जाता है। भूमि पर उगी हुई घास गाय के चरने से जल्दी बढ़ती एवं घनी होती है। बीजयुक्त पकी घास खाकर भूमि पर विचरण करके चरते हुए गायों के गोबर के द्वारा एक भूमि से दूसरी भूमि (स्थान) पर घास के बीजों का स्थानांतरण होता रहता है। आज के समय में वनों के अधिक नष्ट होने का कारण भी गोवंश और गोपालकों की कमी ही है, क्योंकि गोपालकों की संख्या अधिक होती तो गायों की संख्या भी अधिक होती और अधिक गायों को चराने के लिये गोपालक वनों को जाते, जिससे वनों की सुरक्षा वे स्वयं करते तो वनों की बहुत वृद्धि होती, किंतु अब ऐसा न होने से वन असुरक्षित हो गये हैं।
गोसेवा से जितना लौकिक लाभ है, उतना ही अलौकिक लाभ भी है। जो गोसेवा निष्कामभाव से की जाती है अर्थात् पूरी उदारता से की जाती है, उसका सीधा सम्बन्ध भगवान की सेवा से ही होता है। इसलिये गायों की सेवा परम लाभ का साधन है। गाय स्वयं पवित्र है, इसलिये उसका दूध भी परम पवित्र है। गाय अपवित्र वस्तु को भी पवित्र बना देती है, क्योंकि उसके शरीर में पवित्रता के अलावा और कुछ है ही नहीं।



चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?

गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं
इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है। गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है।
गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।
गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला, उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है। चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।
गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है। यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है। अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के कारण पंचगव्य चिकित्सा में उपयोगी साबित हो रहा है।



श्रीकृष्ण ने हमें गाय का स्वरूप बताया

श्रीकृष्ण ने हमें गाय का स्वरूप बताया

भगवान श्रीकृष्ण ने गाय तथा उसके बच्चों को अत्यन्त पवित्र भूमि पर खड़ा किया और सदा के लिए यह विधान कर दिया कि गाय से प्रेम करना, उस पर श्रद्धा रखना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य है क्योंकि गाय एक देवता है, जो पशु के रूप में पृथ्वी पर विचरती है। ऐसा करके भगवान श्रीकृष्ण ने गाय के ऊपर से पशुत्व का पर्दा हटा दिया, जिससे मनुष्य की माँ के रूप में गौ का रहस्यमय स्वरूप अपने दिव्य प्रकाश से प्रस्फुटित हो गया। जिन नेत्रों से गाय का वह वास्तविक रूप देखा जा सकता था, मनुष्य के उन नेत्रों पर अंधकार का जाल पड़ा हुआ था। श्रीकृष्ण ने इसी जाले को काटकर अलग कर दिया, तभी मनुष्य को गाय के प्रकाशमान रूप के दर्शन हुए। वास्तव में, श्रीकृष्ण ने गाय के उस आध्यात्मिक स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने का कार्य किया।
मथुरा के निकट वृन्दावन के वनप्रदेश में प्रतिवर्ष इन्द्र के सम्मानार्थ बड़ी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता था। श्रीकृष्ण ने इस प्राचीन धार्मिक प्रथा के विरूद्ध अपनी आवाज ऊँची की। उन्होंने अपने पिता नन्द जी को, जो उस ग्रामीण प्रदेश के अधिपति तथा वृन्दावन के प्रधान व्यक्ति थे, अनुमति दी कि इन्द्र की नहीं, बल्कि गायों की पूजा की जाए, जो वन-पर्वतों की देवी हैं। इन्द्र इस व्यवहार से बड़े क्रोधित हुए और उनमें प्रतिशोध की भावना जाग्रत हुई। उन्होंने मेघों को आज्ञा दी कि वृन्दावन के ऊपर भयंकर काली घटा बनकर छा जाओ, कड़को, गरजों, बिजली चमकाओ, प्रचण्ड पवन द्वारा पानी की तीक्ष्ण बौछार फेंको तथा भीषण उत्पात मचाकर श्रीकृष्ण के वृन्दावन को मनुष्य तथा पशुओं सहित नष्ट कर दो। इन्द्र के क्रोध से भगवान श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण वृन्दावन व वनप्रदेश की रक्षा की। लोगों ने देखा कि श्रीकृष्ण ने अपने एक हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाकर एक विशाल अभेद्य छाता बना लिया और उसके द्वारा पूरे सप्ताह भर उस भयानक तूफान को लोगों के निकट नहीं आने दिया।
वास्तव में, श्रीकृष्ण के विषय में इन्द्र बड़ी भूल में थे। अंत में, इन्द्र के ज्ञान नेत्र खुल गए। उन्होंने अपने स्वामी तथा सारी सृष्टि के स्वामी श्रीकृष्ण को पहचान लिया। इन्द्र अपनी सारी शक्तियों के साथ उनकी शरण में आ गए। भगवान श्रीकृष्ण का ‘गोविन्द’ नाम उस दिन नए अर्थ में प्रसिद्ध हुआ। अब से श्रीकृष्ण गाय को इन्द्र से भी अधिक सम्मान के योग्य समझेंगे।

जब इन्द्र का अहंकार नष्ट हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रभाव को जाना और भगवान के शरणागत हुए, तब उस समय कामधेनु गाय ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, इसी कारण से यह दिन कार्तिक शुक्ल अष्टमी धूमधाम से ‘गोपाष्टमी’ पर्व के रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।


गौ की उपयोगिता

गौ की उपयोगिता

प्राचीन भारतीय गुरूकुल शिक्षा-व्यवस्था में गुरू की सेवा के साथ-साथ गाय की सेवा भी आवश्यक थी। मुगल सम्राट बाबर ने तो राज्य को स्थायी रखने का मुख्य साधन गोवंश की रक्षा जानते हुए अपने पुत्र हुमायूँ को गोरक्षा की विशेष आज्ञा भी दी थी। गोसेवा के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है- ‘जो पुण्य तीर्थों के स्नान में है, जो पुण्य ब्राह्मणों को भोजन कराने में है, जो पुण्य व्रतोपवास तथा तपस्या द्वारा प्राप्त होता है, जो पुण्य श्रेष्ठ दान देने में है और जो पुण्य देवताओं की अर्चना में है, वह पुण्य तो केवल गाय की सेवा से ही तुरन्त प्राप्त हो जाता है।’
गाय के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है कि ‘जिस गाय की पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु, मुख में रुद्र, मध्य में समस्त देवगण, रोमकूपों में महर्षिगण, पूँछ में नाग, खुराग्रों में आठों कुलपर्वत, मूत्र में गंगा आदि नदियाँ, दोनों नेत्रों में सूर्य और चन्द्रमा तथा स्तनों में वेद निवास करते हैं, वह गाय मुझे वर देने वाली हो।’
जीवनीशक्ति गोदुग्ध की महिमा में बताया गया है कि यदि पृथ्वी तल पर गाय का दूध न होता तो ईश्वर की संतानों का पालन-पोषण एवं वृद्धि नहीं हो पाती। दैवयोग से किसी का जीवन रह भी जाता तो वह रूखा, वीर्यहीन, शक्तिहीन, अतिकृश और कुरूप होता।
महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि च्यवन ने राजा नहुष से कहा- हे राजन्! मैं इस संसार में गौओं के समान कोई दूसरा धन नहीं देखता हूँ। पौराणिक मत है कि जगत में सर्वप्रथम वेद, अग्नि, गाय तथा ब्राह्मण की रचना हुई। वेदोक्ति है कि गाय सम्पूर्ण ब्राह्मण का स्वरूप है।


गौ - सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक

गौ - सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक

वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से भवन-निर्माण से पूर्व सवत्साधेनु अर्थात् बछड़े के साथ गाय को लाकर उस भूमि पर बाँधना भूमि-दोषों का अपमार्जन करने वाला तथा पुण्यकारी होता है। गाय जब बच्चे को दुलारती है तो उसके मुख से निकला फेन उस भूमि को पवित्र बनाता है।
महाभारत के अनुसार, जहाँ गाय निर्भयतापूर्वक बैठकर साँस लेती है, वहाँ के सारे पापों को हर लेती है। संतान लाभ के लिये गौ-सेवा से उत्तम कोई उपाय नहीं है। गाय के रँभाने की आवाज कान में पड़ना मंगलकारी होता है। पुराणों में तो गो-रज को पापविनाशक बताया गया है। गाय की महिमा व्यक्त करते हुए महाकवि घाघ कहते हैं- ‘गाय के समान धन नहीं है और गेहूँ के समान अन्न नहीं है।’ वे आगे कहते हैं- ‘जिस किसान के पास गाय नहीं है, वह वास्तव में दरिद्र है।’
यह सत्य है कि गाय का दूध पीने से बल और बुद्धि वृद्धि को प्राप्त होते हैं। गाय का दूध छोटे बच्चों के विकास में सहायक होता है। गाय के दूध में कैल्शियम, फास्फोरस, सोडियम, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयोडीन, क्लोरीन, लोहा, ताँबा, मैंगनीज, सल्फर, विटामिन ए, विटामिन डी और बी-काॅम्प्लेक्स सहजता से प्राप्त होते हैं। गोमूत्र का सेवन रोग-प्रतिरोधक का कार्य करता है। गोमूत्र फ्लू, गठिया, कुष्ठ के लिये भी उपचारक है। दूध से दही, मट्ठा बनाकर दस्तजनित बीमारियों से बचा जा सकता है।

बायोगैस बनाने के लिए गाय के गोबर का उपयोग कर प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखा जा सकता है। गोबर से बने उपले जलने पर वातावरण के अनुपयुक्त कीटाणुओं का नाश करते हैं, वातावरण को शुद्ध रखते हैं। गोबर विषरोधी होता है। एटाॅमिक रिएक्टर में विकिरण से बचाव के लिये आज भी गाय का गोबर ही कारगर है। अनिष्ट की आशंका को सबसे पहले आँकने की क्षमता गाय में ही होती है। प्राकृतिक आपदा के आगमन से पूर्व गायों के व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है, परंतु हम उसे आज समझ नहीं पाते हैं और उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वस्तुतः जीवन में सुख, शांति, समृद्धि लाने वाली का नाम ही गाय है।


गौओं के दान की प्रथा

गौओं के दान की प्रथा

गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है। वैदिक काल में गाय का दान करने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। दान का अवसर पाकर धनिक लोगों को आनन्द होता था। ‘मैं गाय का दान करूँगा’- इस प्रकार बोलना ही शिष्ट पुरुषों की परिपाटी थी। ‘मैं गाय का दान नहीं करूँगा’- इस प्रकार कोई नहीं बोलता था। गाय का दान करने वाले को रोकना बड़ा भारी पाप समझा जाता था।
राजा तथा देवता गौ का दान करते थे। घर पर आए हुए अतिथि को गौ का दूध पीने के लिए अवश्य दिया जाता था। यज्ञ आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में गौएँ दी जाती थीं। रोगी के उपयोग हेतु, जिससे उसका उपचार हो सके, गाय दान में दी जाती थी, ताकि वह गाय का दूध पीकर रोगमुक्त हो सके।
वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी ‘तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो’, यह कहने की परम्परा थी। दान में उत्तम, दुधारू व तघ गौ के ही देने की विधान है। दाता को चाहिए कि वह तरूण गाय को बछड़े सहित दान दे। धनवान पुरुष का मापदण्ड उसके पास होने वाली गायों की संख्या थी। गायों की संख्या के अनुसार, गाय-पालकों को उपाधि दी जाती थी। वैदिक काल में गोधन को श्रेष्ठ धन माना गया था।
वैदिक काल में किसी भी प्रकार से गाय को कष्ट पहुँचाना, महापाप समझा जाता था। गायों की रक्षा के अनेक उदाहरण शास्त्रों में हैं। गाय का मान माँ से भी ऊँचा माना जाता था। सभी पुरुष गायों का आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लगे रहते थे। वास्तव में, गाय उनके जीवन का अभिन्न अंग होती थी। गाय के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक काल में गाय जीवन का आधार थी।





साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

हिन्दुस्थान की वर्तमान दयनीय स्थिति में तभी सुधार हो सकता है, जब गोधन का अपव्यय रोका जाए। गोधन का विकास साँड के विकास पर निर्भर है। गाय की अपेक्षा साँड का महत्व सौ गुणा है- ऐसा गोविज्ञान-विशारद एक स्वर से कह रहे हैं।
धर्मग्रंथों में साँड का दान सौ गाय के दान के समान श्रेष्ठ और उद्धार करने वाला बतलाया गया है। आज प्रश्न केवल गाय की रक्षा का ही नहीं, बल्कि गाय के उद्धार व सेवा का है। गली-गली भटकने वाले, भूखे और निर्बल साँडों से काम लेने के कारण ही आज गायों का ह्रास हो रहा है और बैल निर्बल पैदा हो रहे हैं। बलवान, वीर्यवान और बढि़या साँड बढ़ें, तभी हिन्दुस्थान का विकास हो सकता है। अमेरिका, जापान आदि उन्नत देशों में लाखों की कीमत के साँड पशु सृष्टि में युग परिवर्तन कर रहे हैं।
बढि़या साँड पर किया गया खर्च और मेहनत कई गुणा होकर बाहर आती है। वास्तव में, किसी भी कृषि प्रधान देश में साँड ही सच्चा धन है। इसलिए हमारे देश में गोधन की बढ़ोतरी के लिए गाँव-गाँव नन्दी का दान करने की सुन्दर प्रथा चली आ रही है।
कहने को तो हमारे देश में साँडों की कोई कमी नहीं है, किंतु उनमें ऐसे साँड बहुत थोड़े हैं, जिन्हें हम वास्तविक साँड कह सकें। उनमें से अधिकांश नपुंसक व भटकू हैं। एक सर्वोत्तम साँड 50 गायों का यूथपति हो सकता है, तो उसको न्यायोचित खान-पान भी मिलना चाहिए, परन्तु उसे मुश्किल से एक सामान्य जीव जितना खाना भी नहीं मिलता।
इस समय युगधर्म पुकार रहा है कि गाय का दान ना करके बढि़या-से-बढि़या साँड का दान करना चाहिए, जिससे उत्तम गोधन प्राप्त हो सके। जिससे गायों में अधिक दूध देने की शक्ति, स्नेह और लावण्य उत्पन्न होगा। संक्षेप में, साँड का विकास- राष्ट्र का विकास है।